अंडेकर जयंती पर खास
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यह पिछले दरवाजे से संवैधानिक अधिकार खत्म करने की कोशिश
प्रतापसिंह सनकत, वरिष्ठ पत्रकार व ब्लॉगर
+91-93409 31641
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार भारतीय संविधान में आम जन को मिले जनहित याचिका यानी पीआईएल करने के अधिकार को समाप्त कर देना चाहती है; सरकार की ओर से सॉलीसीटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि अब पीआईएल की जरूरत नहीं है क्योंकि इसका उद्देश्य पूरा हो चुका है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पीआईएल पर विचार कर आम नागरिकों के जनहितों की रक्षा कर सकते हैं। पीआईएल का अधिकार रहेगा या समाप्त हो जाएगा इसका फैसला सुप्रीम कोर्ट के 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है।
भारतीय संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार प्रताप सनकत की इस खास स्टोरी में जानिए पीआईएल क्या है, यह आमजन को न्याय दिलाने का कितना धारदार हथियार है और इसके जनक कौन हैं।
सबसे पहले ये बता दें कि आखिर मोदी सरकार का उद्देश्य क्या नजर आता है। जानकार मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी दरअसल अपने मूल संगठन आरएसएस की विचारधारा को आगे ले जा रही है। एक दौर था जब संघी डॉ. अंबेडकर को गालियां बकते थे। धर्मनिरपेक्षता को अस्वीकार करते थे। जबसे केंद्र में भाजपा की सरकार काबजि हुई है तब से उसके दो प्रयास स्पष्ट नजर आते हैं;
1 - संविधान और डेमोक्रेटिक ताकतों, संस्थानों को कमजोर करना।
2 - न्यायपालिका की सक्रियता को कम करना।
पीआईएल का अधिकार समाप्त करना सीधे तौर पर न्यायपालिका का कमजोर करना है;
जस्टिस लोढा ने तो 15 पैसे के पोस्टकारृड को ही याचिका माना था
राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायाधीश गुमानमल लोढा ने तो 15 पैसे के पोस्टकार्ड को ही जनहित याचिका माना था। उनका ये कदम मील कर पत्थर साबति हुआ।
भारत में आम नागरिकों को जनहित याचिका यानी PIL दायर करने का अधिकार 1976 से मिला और 1980 के दशक में इसे व्यापक रूप मिला।
1976 में न्यायमूर्ति सी आर कृष्णा अय्यर ने मुंबई कामगार सभा बनाम अब्दुल थाई मामले में पहली बार जनहित याचिका की अवधारणा शुरू की। इसी को भारत में PIL की शुरुआत माना जाता है।
1979 में पहले व्यावहारिक पल मामला हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य था। इसमें बिहार की जेल में सालों से बिना मुकदमे के बंद 40,000 कैदियों को रिहा कराया गया।
1982 में एसपी गुप्ता बनाम भारत संघ के केस में न्यायमूर्ति पीएम भगवती ने तय किया कि अब कोई भी आम नागरिक या सामाजिक संगठन जनहित के मामलों में सीधे सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट जा सकता है भले ही वह खुद पीड़ित ना हो। यहीं से pIL को एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में मान्यता मिली।
ये भी जानिए-
PIL व्यवस्था को खत्म करने की मांग मोदी सरकार ने की।
9 अप्रैल 2026 को 9 जजों की संविधान पीठ के सामने भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने pIL खत्म करने की मांग की।
मोदी सरकार का तर्क है
1. जिस उद्देश्य से जनहित याचिका की शुरुआत की गई थी वह अब काफी हद तक पूरा हो चुका है।
2. वर्तमान में इसका दुरुपयोग अधिक हो रहा है।
3. इसलिए PIL ढांचे की समीक्षा कर कर इसे पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए। मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि सार्वजनिक हित याचिका PIL को समाप्त करने का समय आ गया है। इसका दुरुपयोग हो रहा है और यह अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। सरकार का कहना है कि शुरुआत एक अपवाद के रूप में हुई थी लेकिन अब इसका दायरा इतना बढ़ गया है कि यह मूल नियम को ही प्रभावित कर रहा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ इस पर सुनवाई कर रही थी।
4. pil यानी पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत लागू की जाती है। अनुच्छेद 32 में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार है।
5. अनुच्छेद 32 के मुख्य बिंदु-
1. मौलिक अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट में जाने का अधिकार।
2. सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आदेश देने का अधिकार।
3. pIL के माध्यम से आम जनता के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है।
यह ब्लॉग/आर्टिकल वरिष्ठ पत्रकार व ब्लॉगर प्रताप सनकत (+91-93409 31641) द्वारा संपादित किया गया है।

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